`अनिरुद्ध पहाट-१८’ एक विश्वास असावा पुरता। कर्ता हर्ता गुरु ऐसा।।
।। हरि ॐ ।। तूं मजकडे अनन्य पाहीं। पाहिन तुजकडे तैसाच मीही। माझ्या गुरूनें अन्य कांहीं। शिकविलें नाहींच मजलागीं।।७३।। नलगे साधनसंपन्नता। नलगे षट्शास्त्रचातुर्यता। एक विश्वास असावा पुरता। कर्ता हर्ता गुरु … Read More











